
मुखडा क्या देखे दर्पण में
जब मन ही साफ नहीं तेरा,,
तू सोच जरा,,
ये शरीर इक आश्रय है
जिसपर आश्रित जीवन है पूरा,,
यहाँ कदर कि सी को क्या तेरी
बस धन ही सबका दाता है,,
जो पास तेरे वो साथ नहीं
तो क्यों उसपर इठलाता है,,
सदुपयोग कर जीवन का
क्यों इधर-उधर भरमाता है,,
दिल का सच्चा मेहनतकश
Read More! Earn More! Learn More!
