मुखडा क्या देखे दर्पण में
जब मन ही साफ नहीं तेरा,,
तू सोच जरा,,
ये शरीर इक आश्रय है
जिसपर आश्रित जीवन है पूरा,,
यहाँ कदर कि सी को क्या तेरी
बस धन ही सबका दाता है,,
जो पास तेरे वो साथ नहीं
तो क्यों उसपर इठलाता है,,
सदुपयोग कर जीवन का
क्यों इधर-उधर भरमाता है,,
दिल का सच्चा मेहनतकश और ईमानदार
व्यक्ति यहाँ ठोकरे खाता है ,
जब मानुष तन में जनम मिला
तो क्यों तु व्यर्थ करे इसको,,
अरे सोच जरा!
सुकर्म करूं नित धर्म करूं
क्या इसमें कोई घाटा है मेरा,,
अब सोचता हूँ गर व्यर्थ है यह तो
मुखडा क्या देखूं दर्पण में,
जब मन ही साफ नहीं मेरा ॥


