मैं तेरी तौहीन लफ़्ज़ों में करूँ हरगिज नहीं !
बेवफ़ाई के बाद नज़रों में रखूँ हरगिज नहीं !!
तेरा दिया हर जख्म दिल पर लेता आ रहा हूँ !
आज भी तेरा दर्द दिल में रखूँ हरगिज नहीं !!
तेरी मासूमियत थी जिसने मुझे झुकाया था !
आज मैं बेवजह ही झुक जाऊँ हरगिज नहीं !!
माना कि तेरे असगर बहुत हैं इस जहान में !
मैं भी उनका रकीब बन जाऊँ हरगिज नहीं !!
देव फितरत में जिनके थी फरेबी मोहब्बत !
मैं उनसे मोहब्बत कर जाऊँ हरगिज नहीं !!
©देव एक शायर


