दिल से रंजिशें न गईं
लकीरें हाथों की घिसती गईं,
कभी आँखों से अश्रु बन कर
बहते दर्द को पोछते,
कभी पसीना बन कर माथे से
मन के बहते कशमकश को पोछते।
वक्त बदस्तूर ही चलता रहा
कराहते दर्द थे जो मेरे,
सिकुड़ कर सिसकियाँ बनती गईं।
किस्मत की लकीरें जो थी कभी
मेरे माथे और हाथों पर,
जगह उनके दर्द की दरारें खिंच गईं।
जुर्रतों ने मेरी मुझे थोड़ी तसल्ली तो दी जरूर
पर कुछ रंजिशें हैं आज भी मुझे जिन्दगी से,
जो इस दिल से कभी नहीं गईं।
Author-pragyanshu shekhar
