कभी भीड़ में
कभी तन्हाई में
ढ़ूँढ़ा अक्सर मैंने तुम्हें
अपने भावों की गहराई में।
कभी मंदिर में
कभी मस्जिद में
ढ़ूँढना चाहा मैंने अक्सर तुम्हें
अपने ख्वाबों की मज़लिस में।
ना तुम दिखते हो इधर
ना तुम मिलते हो उधर
आखिर कोई तो मुझे बताए
जाने तुम रहते हो किधर।
सुना है मैंने लोगों से
ये दुनिया है तुम्हारी बनाई
फिर भी इस दुनिया में
तुम्हारी कमी क्यों इतनी गहराई।
सुना है मेरे प्राण का हिस्सा है तू
फिर भी जाने मुझसे कहाँ छिपा बैठा है तू
कभी तो मुझसे आकर मिल ऐ मेरे ख़ुदा
क्या तुझसे मिलने को मुझे,
करना होगा मौत तक का इंतजार?


