खाई कैसी यह समाज की,

अहमियत नहीं यहाँ इंसान की.


यहां आज भी जाती पूजी जाती है,

और कर्म निंदा पाती है.


मूर्ति फसलों की गढ़ते वो अपनी अविरल श्रम से,

उनके रक्त स्वेद मिश्रित माटी ही अमृत उपजाती है.


क्यों अधीनता का चक्र निरंतर

वंचित करता अधिकारों से?

स्वाभिमान का सिंचन भी अब

शुष्क होता जाता निरंतर.

मानो वह भी आहत थथकर झुकता चला...