जाते जाते मुझको रोकना नहीं
मुझको तुम अब ज़रा भी टोकना नहीं
जो था बेज़ुबान, बेज़ुबान रह गया
फिर यूँ इस तरह दिल किसी का तोड़ना नहीं
आहिस्ता आहिस्ता ही सही वो आया तो था
बेदर्दी किसी से अब यूँ तुम मुँह मोड़ना नहीं
ग़म के साये तले ज़िन्दगी बसर हो रही है
फटी हो चादर तो उसे ओढ़ना नहीं
चोट लग जाती है हाथों में अक्सर
टूटा हो शीशा तो उसे 'सफ़र' जोड़ना नहीं


