हम हिंदी कहलाते हैं।
जब अतिथि आते हैं
तो अपरिचित-परिचित हो जाते हैं
हम अपरिचिता को अपना बनाना जानाते हैं
हम नम आंखों को पूछना जानते हैं
हम शीश झुकाना जानते हैं
हम अतिथि को भगवान मानते हैं
शायद ................. इसीलिए हम हिंदी कहलाते हैं।
प्रेरणा बडगूजर


