भोर का उपक्रम तोड़कर

नित जागता है कौन वह ? 

ओस से भीगी धरा पर

हैं प्रथम पदचिह्न किसके ?

राष्ट्र के भरण- पोषण का

है कंधे पर दायित्व जिसके !

वो परिश्रमी डटा रहेगा

अन्नदाता सदा अथक, 

सूर्य की प्रथम किरण से

और चिलखती धूप तक, 

भार भुजा पर धरे धरा का

क्यों खडा़ है मौन वह ?