आज मेरे पास कोई कविता नहीं
आज मुझे कहनी एक कहानी है ।
दराज से निकली,
समय की गर्त में लिपटी उम्र से बूढ़ी,
चिट्ठियों की ज़ुबानी है ।
पहली चिट्ठी,
मेरे प्यारे पापा के नाम की कहना था उनसे,
पिया के घर में बाबुल की याद बहुत सताती है ।
लेकिन, कहता है डाकिया....
घर में टंगे लकड़ी के फ्रेम में लगी फोटो तक ...
कोई चिट्ठी नहीं जाती है ।
दूसरी चिट्ठी,
मेरी भोली मां के नाम की बताना था उसको,
हर क्षण उसकी झोली जैसे मुझे बुलाती है ।
पर मां की सूनी, पथराई आंखें, अब मेरी....
कोई चिट्ठी नहीं पढ़ पाती हैं ।
तीसरी चिट्ठी,
मेरे छुटके भैया के नाम की जाने
उससे कितना लाड लडाना था
मेरी राखी उसे बुलाती है...
लेकिन पैसों में तुलते रिश्तों को कोई चिट्ठी संभाल नहीं पाती है ।
चौथी चिट्ठी मेरी सखी के नाम की जतलाना था
उसको झूठा किस्सा गलियां भी उसकी याद दिलाती हैं ।
पर जान गई हूं......
गलतफहमियों के समंदर पर कोई चिट्ठी तैर नहीं पाती है ।
आखिरी चिट्ठी मेरे नन्हें के नाम की जो मेरे गर्भ में आया,
पर अजन्मा रहा उसे सुनाना था,
मैं तेरी मां हूं....
उसकी धड़कन अब भी कहीं बाकी है
लेकिन कोई तो बताए..
क्या उजड़ी कोख तक...
कोई चिट्ठी जाती है ?????