बहुत याद आती हैं
वो इबारतें जो खिड़की से छनती धूप तुम्हारे बदन पे लिखा करती थी।
उन पेचीदा सी शक्लों में मैं अपनी पसंद के हर्फ़ भरा करती थी,
कितनी कहानियाँ बुन ली थी मैंने तेरे पैरहन के धागों से,
कितने सपने छुपा कर मेरी जेबों में भर लिए थे।
सोचा था जब मिलोगे मुझ से मेरे बन कर,
उन सपनों की चिलमन से अपना घर सजा लूँगी
और सुकूँ से उस छनती धूप का रक़्स तेरे बदन पे निहारा करूँगी ।
अब देखती हूँ मेरे हिस्से का सूरज इन इमारतों के दरिया में कहीं छुप सा गया है
और ख्वाहिशों का चाँद भी सहम कर बुझ सा गया है।
ना इस कहानी का अब कोई ही छोर नज़र आता है,
ना ख्वाबों को पनाह मिलती है,
जिंदगी अब सुबह से शाम और शाम से सुबह बस घड़ी के काँटो के संग ढलती है।
अब पढ़ती हूँ वो इबारतें जो तेरे चेहरे पे धूप नहीं फ़िक्र लिख जाती है,
जिंदगी जीने की जद्दोजहद में पल पल ये जिंदगी ही हम से दूर चली जाती है।