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बहुत याद आती है

बहुत याद आती हैं वो इबारतें जो खिड़की से छनती धूप तुम्हारे बदन पे लिखा करती थी। उन पेचीदा सी शक्लों में मैं अपनी पसंद के हर्फ़ भरा करती थी, कितनी कहानियाँ बुन ली थी मैंने तेरे पैरहन के धागों से, कितने सपने छुपा कर मेरी जेबों में भर लिए थे। सोचा था जब मिलोगे मुझ से मेरे बन कर, उन सपनों की चिलमन से अपना घर सजा लूँगी और सुकूँ से उस छनती धूप का रक़्स  तेरे बदन पे  निहारा करूँगी । अब देखती हू
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