अच्छा सुनो
क्या वो शाम याद है
जब थमी थी सांसे तुम्हारी
लेकर आगोश में मुझे
जब ठहरा था वक़्त
मेरे और तुम्हारे
होंठो के बीच में
खिलखिलाहटों से गुंजा था
वो कमरा
जुगनुओं-सा जगमगा उठा था
मेरा चेहरा
क्या तुम्हें याद है वो
शाम का पहरा ।।
सुकूँ-सा था उस ढ़लती शाम में
बेख़ौफ़-सी ख्वाहिशें
मचल रही थी तुम्हारे बाहों में।।
अधूरापन पूरा हो गया था
तुम्हारी बाहों में
क्या तुम्हें याद है मेरा चेहरा?