लिखना तब जब कुछ ना लिखने को मिले ..
ऐसे ही कुछ भी अचानक से लिखना
याद करते हुुए या याद आते हुए
वो जो था दरमियाँ अपने लिखना।
थोड़ा अच्छा,थोड़ा बुरा-सा लिखना
थोड़ा झूठ,थोड़ा सच लिखना
जिंदगी के हर रंग को लिखना
पर
लिखना लाल को थोड़ा ज्यादा
क्योंकि पसंद है मुझे बहता लाल रंग
अपने अंदर ,धड़कते दिल के अंदर।
काली घटाओं-सी जिंदगी को
जब लिखना
तो चुरा कर थोड़ा
उसमे इंद्रधनुष को भरना।
लिखना तब जब -
सब खाली हो अंदर तुम्हारे हर तरफ से
पर बचा हो गर कुछ
तो वो मैं बचा रहूँ तुम में....
फिर लिखना मुझे...।
हर्फ़-हर्फ़ जब मैं पढू
तो
खुद का खोया हुआ
हर हिस्सा
तुम्हारी लिखावट में पाऊं.....
लिखना तब जब लिखना चाहो...।।
Preeति /13nov2017


