
"तहज़ीब के नाम पर बंदिशे लगायी गयी
हम लड़कियां है हर बार बात बस यही बतायी गयी।
"पायल की छनकती,शोख़ आवाजें बारिश की बूंदों के साथ अठखेलियां कर रही थी.
बिलकुल बेपरवाह-सी,मगन होकर, स्वच्छंद बढ़े जा रही थी गलियों में
जैसे बारिश का पानी बहे जा रहा था बेपरवाह,बेतरतीब सा.
नन्हे-नन्हे कदमो
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