"तहज़ीब के नाम पर बंदिशे लगायी गयी हम लड़कियां है हर बार बात बस यही बतायी गयी। "पायल की छनकती,शोख़ आवाजें बारिश की बूंदों के साथ अठखेलियां कर रही थी. बिलकुल बेपरवाह-सी,मगन होकर, स्वच्छंद बढ़े जा रही थी गलियों में जैसे बारिश का पानी बहे जा रहा था बेपरवाह,बेतरतीब सा. नन्हे-नन्हे कदमो के निशाँ गीली मिट्टी पर मासूमियत छोड़े जा रहे थे और हाथों में कागज की नाव मानो उसके बचपन को पुरा कर रहे थे...। तभी कड़कती रौबदार-सी आवाज़ बारिशों के खिलखिलाहट को चीरते हुवे गूँजी-- "छवि अंदर आ,ऐसे "लड़कियों" को बाहर घूमना 'शोभा' नही देता..." और.... "बचपन को समेटते वो अंदर आगयी. ‌