होंठों से सरक के गर्दन तक गयी
मेरी जाँ, मेरी जाँ वहीं अटक सी गयी
तुझे हाथों से छुड़ाकर फेंका कई दफ़ा
तू ख़ुशबू की तरह मेरे जिस्म से लिपट सी गयी
ना जाने कितने पत्थर फेंके, कितने आइने तोड़े
तू दिखा फिर भी, नज़र जिधर भी गयी
मेरी तन्हाईओं में आ, पन्नों पे बिखर जा
मैं तो गया ही था काम से, अब तो ये ग़ज़ल भी गयी ।।


