गिर गया होगा कभी एक टुकड़ा चांद का

और गया पाया वो होगा

इस धरा की ओट में

चांदनी ने फिर लिपटकर 

जीवित किया होगा उसे

और वो टुकड़ा रूप पा

बन गया होगा कुसुम

वो कुसुम जो गूंथ कर 

तुम गई हो पास से

वस्तुएं जीवन्त हुईं

उस महकती स्वास से

पन्ने हैं गाने लगे 

कोई मिलन का गीत सा

है कलम भी साथ में

सुर ताल सा, मनमीत सा

उस कुसुम की बाट में

है खड़ा गुलदान भी 

क्या मनोहर छवि है उसकी

कह रहा नभगान भी 

और ये क्या 

आतुर हुआ है 

अब तो सावन भी सखी

तुम जो गुजरी पास से

गुजर के घटा भी गई

तुम नयन उन्माद हो

तुम बांसुरी सा वाद हो

है कुसुम तुमसे सुगंधित

तुम सुगंधित फ़ाग हो ।