उम्र
एक मुकम्मल ग़ज़ल की तरह होती है
जैसे कुछ हर्फ़ों के मिलने से शेर तैयार होते हैं
जिन्हें मिसरा-ए-ऊला से मिसरा-ए-सानी तक
का सफर तय करना पड़ता है
उसी तरह विलादत से शुरू हुई धड़कनों की दौड़
वफ़ात की अंजुमन में जा कर थमती है
और साँसे ग़ज़ल की रूहानियत जैसी होती हैं
जो किसी तख़ल्लुस की मोहताज नहीं होतीं
गम और खुशी रदीफ़ और काफिये की तरह होते हैं
जो एक दूसरे के लिए साया-ए-सर की तरह हैं
जो अगर ना हों तो ज़िन्दगी ग़ज़ल नहीं बनती
और ग़ज़ल ज़िन्दगी।

