कैसे मान लूं इस देश को मैं आजाद ? 

कैसे कहें दूं उन नौजवानों को क्रांतिकारी ? 

कानों पर ना रेंगती हो जूं , जिनको महसूस ना होता कुछ !!

उत्पीड़न होता हैं जब नारी का , फिरते हैं सिर उठाए बलात्कारी 


उनकी बेटियां कहां होंगी प्रयास ? 

मां के वे पुत नहीं , नानी दादी का अभाव जहां 

कैसे होगी आखिर जवान लड़की की रक्षा वहां ?! 

वे सभी हैं जिम्मेदार इन हादसों के 

क्यो नहीं लेते वे सभी जिम्मेदारी

उत्पीड़न होता हैं जब नारी का , फिरते हैं सिर उठाए बलात्कारी 


दलितों की बात कौन करे जब वे माने गए अछूत 

हरे सदा उनकी इज्जत कोई , फिर घोषित होते हैं मृत ! 

वे थी बाते पुरानी , जब ठाकुरजी की रखेल होती थी कोई दलित कुमारी 

यह रीत थी सदियों से चलनेवाली ,‌ तुमने निभाकर पुर्ण की तुम्हारी जिम्मेदारी ! 


कर के वस्त्र हरण , तुम क्यो पढ़ाते हों महाभारत का पाठ ? 

अपनी ऊंची जाति का अहंकार तुम सिर पर जो चढ़ाते हो 

क्यो नहीं होती तुम्हारी क़ौम शर्मसारी ? 

उत्पीड़न होता है जब नारी का , फिरते हैं सिर उठाए बलात्कारी 


औपचारिकता नहीं चाहिए ना चाहिए कठोर वह लफ्ज 

सुरेखा , निर्भया , मनिषा एक लंबी फेहरिस्त की हैं मैंने जारी !

नहीं चाहिए तुम्हारी सडी गली सहानुभूतिपूर्ण साझेदारी !

सालों कभी पुछा हैं क्या उनसे क्या हैं बेटी तेरी मजबुरी? क्या हैं पीड़ा तुम्हारी ?


जो सहते हैं सब कुछ चुपचाप , जो धरते है मौन 

न करके कोई बलात्कार बन जाते हैं वे सारे बलात्कारी 

मेरी बहनों तुम्हें करना होगा कुछ , तुम्हें स्वयं बनना होगा क्रांतिकारी !

तुम्हारे भाई सारे हिजड़ों की फौज हैं , वे स्वयं हैं अबला नारी ! 

क्यो भाईयों सुनकर हिजड़ा लफ्ज अब शर्म नहीं आ रही ?


सहिष्णुता की हद होती हैं पार हर‌ बारी 

उत्पीड़न होता है जब नारी का , फिरते हैं सिर उठाए बलात्कारी