मनुष्य बनना चाहता है पानी

लेकिन वह कब बनता है

पत्थर ...

वह भूल जाता है

अपने आकस्मिक कमाए गए

धन की लहक से


वह बनना पसन्द करता है

झरने का हिस्सा लेकिन

झरने में गिर कर बन जाता है

एक ठहराव

जो कि उसे खींचता है

और बनाता है एक पत्थर ...


पत्थर नापसंद है अब

क्यूंँकि वो सहते है

भीषण देह ताप

मनुष्य नहीं चाहता परिश्रम

वह आखिर तक बनना चाहता है

झरने के हिस्से का पानी

जो चाहता है शांति से ठहरना...



~ प्रयास