हम जब बच्चे थे और बरसात होती थी उस दिन मानो जैसे खुशियों की सौगात होती थी हम अपनी अपनी कागज़ की कश्तियाँ तैराते थे और मस्ती से छप-छप करते भीगते- भिगाते थे बारिश जम के हो इसका सबको इंतज़ार होता था Raini Day उस ज़माने में एक त्यौहार होता था वह मीठी-मीठी गीली सी खुशबू आती थी जब माँ गरम गरम चाय और पकोड़े बनाती थी आज बारिश आती है तो जाम न हो इस बात का डर लगता है घर कैसे और कब पहुंचेगे इस बात का डर लगता है भीगने से कोई बीमारी न हो इस वहम से मन मार लेता हूं लाख चाहते हुए भी मैं अपनी इच्छाओं से हार लेता हूँ ईश्वर करे की वह पुरानी बरसात के दिन फिर से लौट आएं और हम बच्चे बनके, बेजिझक मस्ती में फिर से भीग जाएँ
  • प्रवीण आहूजा