शिखर पर जमा हिम पिघलता नहीं है। नदी रूप तब तक बदलता नहीं है।1 भले यत्न कितने करे रोज मानव। बिना सूर्य के ताप मिलता नहीं है।2 पहाड़ों बिना कब नदी बन सकी है। बिना पत्थरों जल उछलता नहीं है।3 दिये काट जंगल बिना कुछ विचारे। क्षरण हो रहा किंतु खलता नहीं है।4 धरा का किया है सभी ने ही’ दोहन। मगर आह का स्वर निकलता नहीं है।5 जिधर देखिये हो रही छेड़खानी। प्रगति हेतु निर्माण टलता नहीं है।6 नदी में न पानी नहीं कूप में जल। ये’ पर्यावरण अब सँभलता नहीं है।7