दिल छिपी क्या बात मैं समझा नहीं।
कुछ दबे जज़बात मैं समझा नहीं।1
लोग मुझको चाहते थे जान से।
क्यों मिला प्रतिघात मैं समझा नही।2
मैं नहीं बदला न ही तेवर मिरे।
बदले' क्यूँ हालात मैं समझा नहीं।3
साथ में बैठूं तुम्हारे साँझ को।
ढल गई क्यों रात मैं समझा नहीं।4
चाँदनी थी रात नभ बादल न थे।
क्यूँ हुई बरसात मैं समझा नहीं।5
प्यार से हम कर रहे थे गुफ़्तगू।
रूठना बेबात मैं समझा नहीं।6
ना दिया धोखा किसी इंसान को।
लोग दें क्यों घात में समझा नहीं।7
सामने से जो मिला बस प्रेम से।8
किसने' मारी लात मैं समझा नहीं।
जीतने की चाह हरदम मन बसी।
फिर मिली क्यों मात मैं समझा नहीं।9