कहते हैं —
सामाजिक न्याय अब नारा नहीं, ज़रूरत है,
पर जब कविता बनती है उसकी आवाज़ —
छपने में लगती है देर बहुत।

जैसे न्याय का पन्ना भी
किसी फाइल में दबा पड़ा हो,
या संपादक की नज़रों से
'सामाजिक' शब्द कम बिकाऊ लगता हो।

वो पूछते हैं —
"थोड़ी प्रेम, थोड़ी प्रकृति मिला दो",
हम कहते हैं —
"इसमें तो भूख, जाति और अन्याय की आंच है!"
वो चुप हो जाते हैं,
जैसे सच की स्याही उनकी मशीनें जला दे।

कविताएं लिखी जा रही हैं,
पसीने की भाषा में,
पर वे फंस जाती हैं
काग़ज़ और बाज़ार के बीच।