
उस कोख में मेरे जीवन का ,कुछ ऐसा ताना बाना था,
बिन भुख के भी वो खाती थी,पोषण जो मुझे पहुचाना था.
दर्द की उस पीड़ा में ,उस को तो बस मुस्काना था,
कैसे रोती उस पल में वो ,हसमुख जो मुझे बनाना था.
आँखे खोल के दुनिया में ,ज़िस पल मूझको आना था ,
पीड़ा के उस पल पल में ,उसको ही सब सैह जाना था.
मॅा,माजी और मम्मी को बस शब्द बना कर मत छोड़ो,
इतना ही सबसे मेरा कहना है ,इतना ही मुझे समझाना था ...
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