उस कोख में मेरे जीवन का ,कुछ ऐसा ताना बाना था, बिन भुख के भी वो खाती थी,पोषण जो मुझे पहुचाना था. दर्द की उस पीड़ा में ,उस को तो बस मुस्काना था, कैसे रोती उस पल में वो ,हसमुख जो मुझे बनाना था. आँखे खोल के दुनिया में ,ज़िस पल मूझको आना था , पीड़ा के उस पल पल में ,उसको ही सब सैह जाना था. मॅा,माजी और मम्मी को बस शब्द बना कर मत छोड़ो, इतना ही सबसे मेरा कहना है ,इतना ही मुझे समझाना था .... इतना ही मुझे समझाना था .......   ईन न्नहे न्नहे हाथो को ,अब पन्नो पे जो चलवाना था . कुछ अच्छे से संसकारो को मूझे माजी से ही पाना था . मॅा की ममता का जादू तो ,कुछ ऐसा जाना माना था. कुछ भी हो चाहे थाली में ,मॅा के हाथो से बस खाना था . मॅा के प्यार से बढकर ना कुछ ,मॅा का दिल ना तुम तोडो. इतना ही सबसे मेरा कहना है ,इतना ही मूझे समझाना था ... इतना ही मूझे समझाना था ........