व्यथा
सामाजिकता से अनभिग्य
कोमलता से अभिभूत
संयम से पूर्ण
धैर्य मन
क्यों विचारता नही ?
व्यथा
मूलता से अनभिग्य
प्रेम से अभिभूत
देवत्व से पूर्ण
कानूनी मन
क्यों सँवारता नही ?
व्यथा
धार्मिकता से अनभिग्य
सेवा से अभिभूत
सच्चाई से पूर्ण
सरकारी मन
क्यों दहकता नही ?
व्यथा
शब्दों से अनभिज्ञ
वेदनाओं से अभिभूत
संवेदना से क्षीण
सामाजिक मन
क्यों बढ़ता नही ?
व्यथा
टूटा ह्रदय
जहाँ ममता नही
जहाँ धूमिल शहर
जहाँ तपता हैं तन
वहाँ ढलता हैं दिन
वहाँ होती हैं रात
कालिख़मई
व्यथा ..!!


