तुम्हारे लिये ही लिखता हूँ
चाँदनी रातों के भूरे भूरे नग़मे
मालूम है मुक्कमल नही
मेरे लब्ज़
तुम्हारे होठों की नमकीन स्पर्श
आज भी लय को बेकरार हैं
आना कभी जन्मों के बंधन को
बेक़ाबू कर
मेरे गीत को,मेरे नग्मों को
मुक़म्मल करने,तब तक मैं
उसी स्याही से अधूरी गीत
लिखता जाता हूँ ।।


