कुछ बिनता हूँ , कुछ चुनता हूँ
उन लम्हों को ही गिनता हूँ
जिसमें तुम हो हमसाया सी
बलखाती हो, इठलाती हो
समझाती सबको मधुर-मधुर
क्यों हमसें रूठ जाती हो ..
कुछ बात बताऊँ तुमको मैं
कुछ राग सुनाऊँ तुमको मैं
थोड़ा ठहरो तुम रुको ज़रा
कुछ पल रहता है, सुनो ज़रा
वो सर्द हवा ,वो मेघ -घटा
इठलाती थी ,जब हँसती थी
मैं पागल मुखरा सा बनकर
कभी उसको तो कभी देखा तुमको
फिर बुला स्याही, कलम उठा
शब्दों से गीत बनाता हूँ
पिरो-पिरो कर लिखता हूं
हाँ तुमको ही मैं बिनता हूँ
कुछ चुनता हूँ, कुछ गिनता हूँ
उन लम्हों के संग ही चलता हूँ ..


