आहिस्ता मद्धम मद्धम

खोजता प्रबुद्ध मन

जीवन के ये वो क्षण

आशाएं सफलता के

खोजता प्रबुद्ध मन


दकियानूसी देखता 

ठेलमठेली झेलता 

दिन पहर सँभाल कर

कौशलता निखरता

श्रमशीलता के गीत

होठो से निकलता


देश व आचार के

न्यूज़ व संसार के 

नमक तेल से सने

तरकारियां परोस कर

खोजता प्रबुद्ध मन

आहिस्ता मद्धम मद्धम


इति भावनाओं से परे

समय की दहाड़ से

बेरोजगारी के कटार से

नेता के फुफकार से

दिन-दिन के दुत्कार से

खोजता प्रबुद्ध मन


नारी तत्व कहा है तू

झोला ले चला हैं तू

रुक सँभल देख तू


क्या सोने वाला भारत है

क्या चौराहें वाला भारत है

सभ्यता जो पुराण में

जन जन के कल्याण मे

किधर खड़ा कहा हैं तू


खोजता प्रबुद्ध मन 

आहिस्ता मद्धम मद्धम..!