काश कि

तुम लौट आते 

अपने सारे शहर को समेट कर

अपने आप को 

बस ले आते अपनों के बीच

अपने गाँव की गलियों में

अपने आम के बग़ीचे में

अपने क्रिकेट वाले मैदान में

अपने नाना के बाग़ान में 



बस कर लेते कोई बहाना

निकल आते 

उस धुँधली रोशनी से दूर

अपने गाँव

जहां सूरज की पहली किरण 

तुम्हें जगा कर 

प्रकाशित कर देता

तब शायद तुम 

औऱ प्रकाशित हों जाते ।