हो रक़ीब तुम तो बता भी दो
ज़िक्र उनका ज़रा सुना भी दो
चिठी-पतरियां कई दिन भरे जो हूं
अब उसका जरा तुम पत्ता भी दो
सुनता हूं वो तुम पर मचल रही
गौरे चेहरे के रंग भी सँवर रहे
बातों में ही उससे मिला तो दो
हो रक़ीब तुम तो जला भी दो ।।


हो रक़ीब तुम तो बता भी दो
ज़िक्र उनका ज़रा सुना भी दो
चिठी-पतरियां कई दिन भरे जो हूं
अब उसका जरा तुम पत्ता भी दो
सुनता हूं वो तुम पर मचल रही
गौरे चेहरे के रंग भी सँवर रहे
बातों में ही उससे मिला तो दो
हो रक़ीब तुम तो जला भी दो ।।