देख रहें मेरे ख़ुदा
ये तेरा इंसान
अक़्ल से अक़बर
विज्ञान से मंगल
व्यहवार से है नादान
पहले मेरे जंगल
फिर मेरे घर पर
चलवाया हैं इसनें
धीमे धीमे बुलडोजर
दूर कहि सुदूर मंगल पर
अधिनियम और न्याय पढ़ाते
बरस बरस में सम्मेलन में
प्रगति के सड़क बनाते
एक दिन हम भी निकल पड़ेगे
ख़ुद की थाथी सब लुटाकर
नातेदारी सब भुलाकर
फिर शमशीर लहरायेगा
फिर तक़दीर लिखा जायेगा
फिर वन उपवन खिल जायेगा
नज़र आयेंगे आम ,अनानास
इंसा कभी न नज़र आयेगा
इंसा कभी न नज़र आयेगा ।।


