आओ साथी
हाथ की लकीरें गिनते
कर्म के पथ को भुलाकर
डरते हो देखकर तुम क्यों
सागर की ऊँची ऊँची लहरें
क्यों खड़े होकर किनारें
डूबने के डर लिये तुम
वक़्त अनगिनत क्यों बिताये
ये सवाल तो है तुम्हारा
अब जो तुम जानते हो
सारे क़िस्से सारे नग़मे
फिर क्यों डरते हो साथी
आओ साथी
हौसलों से हुँकार भर लो
चाहतों को पार कर लो
कर्म से बन तुम महान
राह के सरदार बन लो
बस ठान लो एक बार मन मे
तेरे सपने तेरी मंजिल
सागरों की लहरें तेरी
हर सुबह का सूर्य तेरा
कर दे खुद को इतना उजागर
नाम गूँजे चहुदिशाये ।
@प्रवीनप्रणव


