थैला
एक झोली को मिल जाये जब आकार
ज़रूरतें और खुशियाँ समेटे हर बार
छलकती जेब का विकल्प पहला हूँ
कपड़े का एक मामूली थैला हूँ।
गृहस्ती और जीवन का अहम किरदार
टिक जाऊँ तो मुझमें समाये पूरा बाज़ार
अत्यधिक बोझ से कई बार फटकर फैला हूँ
बेमेल रंगों के धागों से बुना हुआ थैला हूँ।
माँ के मोल भाव से अधिक भर जाता हूँ कई बार
पिता के कांधों पर लटकने में मज़ा आता है हर बार
भैया की साईकल की पिछली सीट पर बैठा झमेला हूँ
एक परिवार की भूख मिटाते आटे का थैला हूँ।
सुबह सुबह सब्ज़ी मंडी की सैर होती है हर इतवार
गर्मियों में आम सर्दियों में संतरे करें खुशबू की बौछार
पांच रुपये की मिर्ची, धनिया और मुफ्त करी पत्तों के बिन अकेला हूँ
गृहणी का दुलारा और रसोई का लाडला थैला हूँ।
दिवाली के मेले में खिलौनों के करता दीदार
संक्रांत के कौथिक में बहलाये चूड़ियों की छनकार
गुड़ की भेली और गरम जलेबी से बना रसीला हूँ
घर बैठे बुज़ुर्गों की लपलपाती जीभ की प्यास बुझाता थैला हूँ।
गाँव की पगडंडियों पर उठाया किताबों का भार
बेसुध ना रह पाता जब कक्षा में होती ज्ञान की बौछार
नादान भूरे पत्थर, लाल हरि चूड़ियों के टुकड़ों से बना रंगीला हूनन्हे छात्र के मन चाहे इंद्रधनुष के अंश सँजोता स्कूल का थैला हूँ।
अक्सर दिखूंगा उस काँधे पर जो हो कवि या पत्रकार
मिलेंगे मुझमें एहसास भरी कविताएं या बदलते वक़्त के समाचार
अपने धुंधलाते अस्तित्व के धक्कों से गिरकर संभला हूँ
कभी दीवार पर एक छोटी सी कील पर लटकता
तो कभी बाज़ार जाते एक काँधे को तरसता थैला हूँ।
बाज़ार की धूल से मेरा अटूट व्यवहार
गाँव की मिट्टी से मेरे रूप में आए निख़ार
बेईमानी की हर वस्तु से हुआ मैला हूँ
गंवार मगर ईमानदार माँ के हाथों से सिला थैला हूँ।
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कौथिक - मेला
भेली - गुड़ का गोल टुकड़ा या पिंड
©️ प्रवीण कोटला, प्रथम काव्य संग्रह, मुसाफिर, नवंबर २०२०

