शक्ति जब निशक्त हो, रात जब वे- वक्त हो
ये तो कभी ना था भगत सिंह के ख्वाबों में,
कैसे चुप रहूं में पड़ा शहीद का जब रक्त हो...
मौन साधे रहते तुम शक्ति के घुमानों में
असंख्य धृतराष्ट्र हैं यहां सत्ता के चुनावों में ।
रात जब वे- वक्त हो , लोग ही आशक्त हों,
कैसे चुप रहूं मैं पड़ा शहीद का जब रक्त हो....
- Praveen Dhakar


