कौन हूं मैं
कभी मूरत हूं
कभी दीपक हूं
कभी ठंडे पानी का घड़ा हूं
पर अंत में मिट्टी हूं मैं
कभी हवा उड़ा ले जाती है
कभी पत्थर रौंद देते है
कभी बारिश महका भी देती है
पर अंत में मिट्टी हूं मैं
कभी घर बना देता हूं
कभी मंदिर और मस्जिद भी
कभी पहाड़ भी बन जाता हूं
पर अंत में मिट्टी हूं मैं
कभी किनारा झील का
कभी सहारा मील का
कभी सहरा भी हो जाता हूं
पर अंत में मिट्टी हूं मैं
कभी आकार धरता हूं
कभी निराकार फिरता हूं
सूख जाने पर टूट भी जाता हूं
पर अंत में मिट्टी हूं मैं
मिट्टी से उठा हूं
मिल जाऊंगा मिट्टी में एक दिन
भ्रम मन में रखता नहीं कोई
क्यूंकि अंत में मिट्टी हूं मैं
#मनु
