वादाखिलाफी भी वही करता है फिर वादा भी;

मोहब्बत भी मुझसे वही करता है, धोखा भी !


नहीं मुझसे कोई भी वाबस्ता उसको अगर; 

मेरे हाल पर क्यों हंसता वही है और रोता भी !

मोहब्बत भी मुझसे वही करता है, धोखा भी...


मैं उसे पत्थर होने का ताना भी नहीं दे सकता; 

मेरे लिए इबादत भी वही और मेरा खुदा भी !

मोहब्बत भी मुझसे वही करता है, धोखा भी...


मुझे याद करता है खुद से वो छुप छुप कर; 

मुझे चाहता भी वही है और मुझे भुलाता भी !

मोहब्बत भी मुझसे वही करता है, धोखा भी...


-प्रभंजन त्रिपाठी