वो जो बड़े प्यार से हम से पेश आ रहे थे;
झूठ फरेब का अपना दुकान चला रहे थे !
जब भी मिलते थे बड़े चाव से मुस्कुराते थे;
यह वही लोग है जो हमें बहुत रुला रहे थे !
झूठ फरेब का अपना दुकान चला रहे थे...
हम नहीं हैं इस जहां में औरों के जैसा;
यह कह के हम को वो बुद्धू बना रहे थे !
झूठ फरेब का अपना दुकान चला रहे थे...
वो आसमान से भी हमें बड़ा बता रहे थे;
गिराने के लिए जो हमें ऊपर चढ़ा रहे थे !
झूठ फरेब का अपना दुकान चला रहे थे...
- प्रभंजन त्रिपाठी


