कुछ शामें ऐसी निकला करती थीं,

दिन भर के काम से "माँ" थक जाया करती थीं

मेरा पेट ख़ाली ना रहे कभी, इसलिए

अपने हाथ फिर भी वो जलाया करती थीं

तब मुझे इसकी अहमियत ना रही,

या यूँ कह लो, मुझे समझ न थीं,

आज जब याद करता हूँ हमारे वो दिन,

अशकों से आँखे मेरी बहती रहती..।