" मत ले माथे पर शिकन तू अपने।”
आँधिया तूफान तो आए दिन आते जाते रहेंगे,
हंसते-हंसते उनको झेल जाने वाले ही
गुलशन को महकाते रहेंगे।।
जब सब डोर थामे वो बैठा है ,
क्यों कर लेता है माथे पर शिकन तू अपने।
झुर्रियां आएं चेहरे पे जब भी
क्यों ना वह मुस्कुराहट की हों।
देख तुझको हंसता शायद,
कहीं कोई और भी मुस्कुरा दे ।
जाने अनजाने में इस तरह ,
कहीं तू भी कुछ खुशियां बिखेर दे।
टूटे हुए जज्बे को किसी के,
फिर से लड़ने का हौसला बंधा दे। ।
मुश्किलें बुरा वक्त बन जब भी आता हैं,
आगे बढ़ने का सही रास्ता भी यही दिखाता है।
क्योंकि जोड़ देता है उन टूटे धागों को,
भुलाकर जिन्हें आगे निकल जाते हैं हम।
बस गम के कोहरे को या, हार से उपजी जलन को ,
मन में जगह ना देना , खुद से चिपकने ना देना।
जीवन की जीवंतता को, कभी हारने ना देना।
'हार' के 'हार' को जीवन को 'हरने' ना देना।।
पोंछ कर आंसुओं को गहरी सांस ले,
एक कदम हौसले का जब भी आगे बढ़ेगा।
आईने में मुस्कुराता हुआ,
तुझे अपना वजूद मिलेगा।
और देख वो भी यही कहेगा
जब सब डोर थामे वो बैठा है,
मत ले माथे पर शिकन तू अपने। ।
डॉ प्रतिभा बलूनी।।


