घरौंदा मेरा
घरौंदा मेरा एक नन्हा सा,
प्यार के तिनकों से हो बुना।
पल फुर्सत के जहां बीते अपनों संग,
विचारों में न हो कभी कोई जंग।
प्यार हो, विश्वास हो,
अपनेपन का एहसास हो।
घर मेरा, बस इतनी बातों में,
सबसे खास हो,
कण-कण में जीवंतता का आभास हो।
घरौंदा मेरा, प्यारा सबसे खास हो।
हर कोना रचनात्मक ऊर्जा से हो भरा,
सुबह का पैगाम लेकर, धूप भी छन छन के आए,
और खुली खिड़कियों से, तांका झांकी कर जाए।
बरसे बूंदे जब सावन की,
मिट्टी की सौंधी खुशबू महक जाए,
भीगा के तन मन को तरोताजा कर जाए।
आए जब ऋतु वसंत की,
बागीचा मेरा रंग-बिरंगी तितलियों से भरा हो,
इंद्रधनुष की जैसे रंगोली से सजा हो,
तुलसी महके मेरे आंगन की ऐसे की
खिंची आए चांदनी भी दूर गगन से।
गौरैया चहके इस तरह से, मेरे आंगन में,
गुंजित हो वीणा जैसे कोई अंतर्मन में।
घरौंदा मेरा, प्यारा सबसे खास हो,
नहीं चाहा कि बहुत आलिशान हो,
पर हाँ , मेरे घरौंदे की अपनी पहचान हो।
नहीं कोई उसमें कभी परेशान हो,
उलझनें आए भी लाख चाहें पर,
पल भर में उनका समाधान हो।
हर सुबह एक नया संकल्प हो,
सीखने, कुछ नया करने की आस हो।
हर पल खुशी से जिया, अपनों के लिए कुछ किया,
अपने होने पर हो नाज़, न हो कोई कभी किसी से उदास।
हर शाम पूर्णता का एहसास हो,
हर रात जहाँ अगले सुबह का जोशिला इंतज़ार हो,
घरौंदा मेरा, प्यारा सबसे खास हो,
जहाँ सब हों साथ, और अटूट विश्वास हो।
घरौंदा मेरा, प्यारा सबसे खास हो।।
