बता कर असहाय कोस रहे थे उसे सभी,
ए बेल, निरर्थक है जीवन तेरा,
उठा सके तू बोझ अपना भी,
साहस तुझमें इतना भी नहीं।
बढ़ने के लिए हर ओर सहारा ढूंढती है,
क्या जीवन में तेरे कोई मूल्य नहीं?

हंसते हुए बेल बोली,
कमजोर तो तू है मानव की,
लचक में तुझे मेरी बेचारगी नजर आती है।
मूल्यहीन जिसे तू रहा बता,
मूल्यवान है वो अहसास कितना।
जा, जा के उस सूखे वृक्ष से पूछ,
खो चुका जो जीवन अपना,
मैंने ही उसे उसकी खोई खुशियां लौटाई हैं,
मृतप्राय से उस जीवन में,
जीवन की लौ मैंने ही जगाई है।

चिपटी भली ही ज़मीन से हूं,
पर उस अभिमानी वृक्ष से तो हूं भली,
परछाई जिसको अपनी ही नजर नहीं आती,
छाया की चाह में जिसकी,
मुसाफिरों की निगाहें तरस जाती हैं।
माना छाया मेरी भी मुझ में ही समा जाती है,
पर थकी उन निगाहों को थोड़ी राहत तो मिल जाती है।

भार अपना मुझमें भी सहने की ताकत नहीं,
फिर भी उस कंटीले साख से तो हूं भली।
पाने की हसरत में फूल जिसके,
काँटे हाथों में हैं चुभ जाते।

स्वाभिमानी उतनी नहीं,
पर अहंकारी वृक्ष से तो हूं भलि।
हूं‍कार तो जो बहुत भरता है,
पर हवा के एक झोंके से उखड़ खड़ा होता है।

कीमत मेरी उस जीव से पूछो,
ऊंचाई तक पहुंचना जिसके बस में नहीं।
अलावा मेरे नरम पत्तों के,
जिसके पास और कुछ भी नहीं।

जीवन मेरा भी निरर्थक नहीं,
सौंदर्य क्या है जीवन में मेरे,
जाकर उस कलाकार से पूछो,
कल्पना में जिसकी नायिका बन कर हूं मैं बैठी।