प्रेम को प्रेम से देखने की
चेष्टा करना।
कारण मत ढूंढ़ना!
स्वंय को सर्वस्व
समझने की भूल भी मत करना!
बस प्रेम को आदर से
अपने समक्ष बिठाना
और अनुभूत करना
ईश्वर से मिले वरदान को!।
इस बात से नतमस्तक हो
जाना प्रेम के समक्ष
की ईश्वर ने तुम्हें चुना है
प्रेम के उपहार के लिए!
प्रेम को वासना से नहीं
साधना से जोड़ना।
और विलीन हो जाना प्रेम में!
न्यौछावर कर देना सर्वस्व
अपना प्रेम में।
अन्यथा तुम खो दोगे
किसी के अनुपम प्रेम को
और पाओगे वही
चाह मिश्रित प्रेम को जो सर्वत्र है
परन्तु प्रेम से ज्यादा चाह है,
जरूरत है , वासना है ।
~प्रतिमा / @PratimaaWrites


