कुछ दुःख नितांत निजी होते हैं, उनका कोई साझेदार नहीं होता!
अतीत से फासला कितना भी बना लें कोई..!
लेकिन अतीत की कड़वी यादें जब तब दिल को दुखाने के लिए कोई ना कोई रास्ता खोज कर आ ही जाती हैं सामने।
मन बिफर उठता है और दिल के भीतर की टीस अंतस को भी भेद डालती है। मिलियन्स आबादी वाली इस दुनिया में इंसान के पास एक व्यक्ति नहीं होता जिससे वो दिल की हर बात कह सके ,
जिसके काँधे पर सर रखकर रो सके!
 अजीब है लेकिन एक कड़वा सच भी है यह कि हर वक़्त लोगों और भीड़ से घिरा रहने वाला इंसान भी अक्सर बिल्कुल अकेला होता है । स्त्रियों के हिस्से में दुख और अकेलेपन को तो ईश्वर ने भी ये सोचकर ज्यादा लिख दिया है कि स्त्री है सह लेगी !!
 सहना स्त्री की प्रकृति है क्योंकि स्त्री पर्यायवाची है पृथ्वी की, जो हर दुख , हर पीड़ा हर तिरस्कार को सहती रहती है बिना कुछ कहे बिना विरोध किये , फिर भी सम्पूर्ण जीवन को , प्रकृति को अपना सहारा ही देती है। हर बीज को जीवन ही देती है हर राहगीर को आसरा ही देती है।
तन्हाई, पीड़ा और अकेलेपन को सह जाना स्त्री की नियति भी है और मजबूरी भी। हमारे समाज में स्त्री को कभी इतना महत्व ही नहीं दिया जाता है कि , कोई उसकी इच्छा, आवश्यकता , जरूरत या पीड़ा पर बात करे , ऐसा सदियों से माना जाता रहा है कि स्त्री है सह लेगी , बर्दाश्त कर लेगी , समझ लेगी की उसको समझने के लिए किसी के पास समय नहीं है अपितु उसे ही समझना है खुद को सबको और सह जाना है वह भी जो उसके लिए उचित नहीं ।
स्त्री के दुःख स्त्री के अंतस में नासूर बन कर पलते हैं जिनके घाव ढके रहते हैं लेकिन भरते नहीं क्योंकि उसे अपने दुख का कभी कोई साझेदार नहीं मिलता।
- प्रतिमा श्रीवास्तव