महामारी के इस समर में हो सकता है

हम दोनोँ बच जाएँ।

हो सकता है सिर्फ तुम बच जाओ!

हो सकता है सिर्फ मैं बच जाऊँ!

हो सकता है दोनोँ त्याग दें

ये नश्वर देह!!

लेकिन देह से मुक्त होकर क्या हमारी

रूहें भी मुक्त हों जाएंगी, इस मृत्युलोक से!

या भटकती रहेंगी हिमालय की पहाड़ियों

के आसपास

या अपने-अपने शहर के इस दैवीय आपदा से वीरान हुए खण्डहरों में!!

कहते हैं एक दूसरे से मिलन की चाह में,

अधूरी ख्वाहिशों के साथ मरने वालों की

आत्माएं मुक्त नहीं हो पाती इस जहाँ से।

तो क्या ये युवा जो रोज मर रहे

मरने के बाद भी भटकते रहेंगे इसी लोक में

प्रेम की तलाश में।

जैसे मैं करती रहती हूँ तुम्हारा इंतज़ार

हर पल-छिन तुम्हें करीब से देखने के लिए!

और चूमना चाहती हूँ तुम्हारा माथा

प्रेम की अतिरेक भावनाओं में बहकर।

मैं मरने से पहले छूना चाहती हूँ तुम्हारे

नर्म मुलायम हाथों को

और चाहती हूँ प्रेम का स्पर्श अपने ह्रदय

के हर कोर पर।

क्या वक्त हमें अवसर देगा मिलने का!

या भटकेंगी हमारी आत्माएं भी

सदियों तक अकेली तन्हा,

प्रेम में आलिंगनबद्ध होने के लिए।

~ प्रतिमा / @PratimaaWrites