वक्त गुजरता जाता है भले हम एक ही जगह एक ही स्थान पर एक ही उम्मीद के साथ हमेशा के लिए ठहरे रहे , या एक दिन , दस दिन या दस साल के लिए.. !

जब भी कुछ ऐसा अनुभव होता है तब दिल ठहर कर ये सोचने को मजबूर हो जाता है कि क्या ये वही जगह है जहाँ मुझे होना था या कोई औऱ..

कोई और शब्द शब्दसः मन को 

अचंभित करता है ,

और मन हज़ारों विचारों उलझनों के उथलपुथल में कहीं खोने लगता है ,भीतर का अकेलापन स्वयं से भी एकाकी हो जाना चाहता है।

अजीबोगरीब हालात हो जाते हैं तब , कुछ ऐसे जिसे खुद के लिए भी समझना मुश्किल हो जाए!

मन की दशो-दिशाएँ आहत होती हैं जब।

मन को समझाने की आदत

किसी भी बुराई से ज्यादा बुरी होती है ,भान होता है..!!

मन को सिर्फ इतना ही जाना

जो सबकी तो सुनता है ,लेकिन 

जिसे अपनी सुनने की इजाजत नहीं होती ..और जिसकी

इज़ाज़त ना हो उसकी आदत भी नहीं होतीऔर इस तरह मन एक दिन बोलना कहना और चाहना ही छोड़ देता है।घने जंगल में किसी वृक्ष के

नीचे या किसी पर्वत की ऊँचाई पर पहुंचकर अगर मन को देखा जाए..

तो सहज ही समझ आ जाता है

इसने क्या खोया ..!!

क्योंकि बाहर का शोर भीतर की आवाजों को दबाने का

मौका नहीं पाता !

कभी कभी मन कुछ बोलना ,कुछ सुनना नहीं चाहता वो सिर्फ खामोशी ढूंढता है जहाँ धड़कनों की आवाज भी साफ सुनाई देती हो और ऐसी शांत पलों में वो चाहता है किसी अपने की आँखों में प्रेम का ज्वार जो बिना कुछ कहे फट पड़े उसके लिए और अपने आगोश में समेट ले उसके बिखरे टुकड़े..!


अंतरात्मा भी जाने कितने ताने-उलाहने देती है !

क्योंकि उसने हर बार चेताया था और मैंने हर बार उसको ठुकराया था !

उन अपनों के लिए ..

जो कभी अपने थे ही नहीं!!

अपनेपन की परिभाषा भी कितनी ख़ुदपरस्त है ,वक्त वक्त पर हक जताने वाले खुद को अपना कहते हैं !

लेकिन वक्त पर कभी भी दायीं या बाई तरफ नजर नहीं आते!!

जब सबसे ज्यादा जरूरत हो तब कहीं नहीं दिखता - महसूस होता है कोई अपनापन ! 

विह्वल ह्रदय में उम्मीद का दिया जलाने के लिए होना चाहिए था उसको , जो कभी कहीं नहीं रहा.. जो कभी कहीं नहीं था..!

~ प्रतिमा / @PratimaaWrites


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