शहर का सारा सूनापन अपने भीतर

समा रख्खा है,


तुम क्या जानों कैसे हमने खुद को

समझा रख्खा है।


कोई जो हमसे पूछे तो उसको बतलाएं हम..


तन्हाइयों के कितने अघोषित लम्हों को

बिता रख्खा है।


दूर तक वीरानी है सहरा भी है पानी भी,

लम्हे हैं ये बेचैनी के और हमारी नकामी भी !


जब जब जिधर ले गई हवा हमको 

जाना पड़ता है ...


तुम क्या जानो कैसे हमने खुद को समझा रख्खा है।


Pratimaa Srivastava