एहसासों में शब्दों को भिगो कर
घर से बहुत दूर रहकर
व्यस्त जिंदगी से
समय निकालकर
काग़ज़ और कलम थामकर
लिखी जाती थी कभी पाती
राह तकते घरवाले और सभी संगी साथी
परेशान हो जाते थे डाकिया काका भी
चिठ्ठी आयी की नहीं तब हर कोई पूछता ही
मिलते ही पढ़ने की भी होड़ लग जाती
शब्द शब्द सुनकर आंखें भर जाती
पढ़ते पढ़ते भेजने वाले की सूरत नज़र आती
एक खत सारे गिले शिकवे दूर करने का था जरिया भी
पढ़ नहीं पाती थीं अक्सर बूढ़ी दादी
फिर भी थी उसे अपने सीने से लगातीं
मानो आ गया हो स्वयं ही उनका नाती
प्रेमी प्रेमिकाओं को थी मिलाती
होती थी जरा रंगीन उनकी पाती
साजन की जब चिट्ठी आती
उसकी महक से
सजनी अक्सर बहक जाती
प्रेम में भीगा पढ़ अक्षर अक्षर
मदमस्त झूमती वो ईधर उधर
थामे अपना प्रेम पत्र
ये उन दिनों की बात है
जब लिखा जाता था खत
आज के दौर में ना रही
वो अद्भुत व्याकुलता पत्र पाने की
ना रही भावों में डूबी वो कला
अपना हाल लिख जाने की।
हां ये उन दिनों की बात है
जब थी किसी को लिखने की बेताबी
तो किसी को पढ़ने की बेसब्री
इंतज़ार की हुआ करती थी वो अनुपम घड़ी
यही नहीं अंतरदेशी मिलती थी घर में पड़ी
दादा जी की चिठ्ठियां मिल जाती थी
दादी के फोटो फ्रेम में जड़ी
उनके ज़माने में बात थी ये बड़ी
ये बात है उन दिनों की
जब चिट्ठियां सहेजी जाती थी
घरों में कहीं
जब किसी की याद बहुत सताती
दोहराई जाती थी
पढ़ी हुई पाती
हां ये बात है दिनों की जब लिखे और पढ़े जाते थे खत
दूर बैठे प्रियजनों का संदेश पहुंचाते थे खत ।
By PratimaPandey
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