
शराफत है हमारी
की अब भी कुछ परवाह करते हैं तुम्हारी,
समझते नहीं हैं ना दुनियादारी।
कभी जो की थी तुमसे यारी,
क्या हुआ जो पड़ गई भारी,
य
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शराफत है हमारी
की अब भी कुछ परवाह करते हैं तुम्हारी,
समझते नहीं हैं ना दुनियादारी।
कभी जो की थी तुमसे यारी,
क्या हुआ जो पड़ गई भारी,
य