बाती बन स्वयं जल जाती है जीवन दूसरों का प्रकाशमान कर जाती है

अपनी ख्वाहिशें मन में दबा औरों के सपनों में वो हकीकत के रंग भर जाती है

कभी मां, कभी पत्नी, कभी बेटी और कभी बहन कहलाती है

दो घरों की जिम्मेदारियां अपने कांधे पे वो खुशी - खुशी उठाती है

ईश्वर का साकार रूप है वो, कभी देवकी है कभी यशोदा है, कभी त्रिदेवों को गोदी में सुलाती अनुसुइया है वो

अपने बच्चों में बोती है संस्कारों के बीज, मां ही उनकी संस्कारशाला होती है

पत्नी के रूप में बन जीवन संगिनी वो अर्धांगिनी कहलाती है

जीवन के अंतिम क्षण तक अपने पति का साथ निभाती है

बहन रूप में अपने भाई की सबसे अच्छी मित्र बन जाती है

अपनी नहीं सिर्फ भाइयों की खुशियों की दुआ रब से मांगती है

हर बेटी अपने घर की शान होती हैं ,अपने माता - पिता का अभिमान होती हैं

मायके हो या हो ससुराल, नारियां सभी रिश्तों को मजबूती से प्रेम डोर में बांध लेती है

कुछ ऐसे दो घरों का रोशन वो जहान करती है

 किसी से नहीं करती है कोई अपेक्षा , 

त्याग और ममता की वो यूं ही प्रतिमूर्ति नहीं कहलाती है

निस्वार्थ भाव से वो अपने कर्तव्य पथ पर चलती जाती है

क्या तुम्हें नहीं लगता जिस पुरुष प्रधान समाज पे तुम इतराते हो

उस समाज को केवल अकेले तुम ही नहीं संभाले हो

नारी नहीं तुम पर निर्भर , नारी से ही हो तुम नर क्यों यह

भूल जाते हो

सृजनकर्ता वहीं है इस संसार की, नारी के हिस्से का प्यार

और सम्मान उसे देने से फिर तुम क्यों कतराते हो

हे पुरुष नारी से इतर नहीं तुम्हारी कोई पहचान, यही बताने अर्धनारीश्वर का लिया था शिव जी ने अवतार ।

- प्रतिमा पांडेय