मैं हूं एक बेटी सयानी ,

पापा बुलाते हैं मुझे राजकुमारी

और परवाह करते मेरी ढेर सारी ,

बचपन से लेकर अब सयाने होने तक पापा ने दिलाई हैं मनपसंद चीजें वही जो हो मुझे प्यारी,

जितना पढ़ना था उतना मुझे पढ़ाया है ।

मेरे हर एक सपने को उम्मीद के रंग से सजाया है,

पापा ने मुझ पर बहुत प्यार लुटाया है।

मेरी हर गलती को मां से छुपाया है ,

हां ! यह अलग बात है बाद में मुझे बहुत समझाया है ,

एक पिता का हर फर्ज निभाया है।

गलती करना गलत नहीं है ,यदि गलती से भी लिया नहीं हो कोई सबक वह है गलत।

मैं बाबा की बिटिया दुलारी हूं,

इसलिए मानती उनकी बातें सारी हूं ।

पापा की अलमारी अक्सर करती हूं मैं साफ ,

एक दिन उनकी डायरी लग गई थी मेरे हाथ ।

पढ़ ली मैंने लाइने चार

उसमें लिखा था ,अब मेरी बेटी ही है मेरा संसार ।

बात यह लग रही नई है ,

पर जब लिखी गई है ,

तब थी दिसंबर की रात, तारीख थी चार

पैदा हुई थी उस दिन में नन्ही सी थी जान ।

मैं समझ गई थी तब ,

पापा करते हैं मुझसे कितना प्यार ।


एक दिन पापा थे बहुत परेशान ,

मैं थी एक सच से अनजान।

उस दिन मां शाम की जब चाय बना रही थीं,

पापा को बहुत समझा रही थीं,

रसोई घर की खिड़की से, मेरे कमरे तक आवाजें आ रही थी।

बेटी तो है ही पराया धन ।

क्या मैं नहीं आई अपना घर छोड़कर ,

तुम्हारे इस आंगन से अपना रिश्ता जोड़ कर ।

माना एक ही बेटी है हमारी ,

हमें चाहे कितनी भी है प्यारी ,

करनी तो पड़ेगी हमें ,उसकी शादी की तैयारी ।

यह कहकर ,मां ने आवाज लगाई थी मैं, पापा और भाई सबको चाय थमाई थी ।

फिर मां ने एक बात मुझे समझाई थी,

होती हैं बेटियां पराई ,करनी ही पड़ती है मां-बाप को उनकी विदाई ।

मेरी आंखें नम हुई जा रही थी ,

जाने क्यों ! मां आज मुझे यह सब बता रही थी।

पूछ ही लिया मैंने मां से आखिर,

इतना सब जो बता रही मुझे किस खातिर ।

तिवारी जी का आया था संदेश ,

सगाई का दिन धराया है ,अगले हफ्ते की पहली तारीख को पंडित जी ने शुभ मुहूर्त बताया है ।

इसलिए तुम्हारे पापा का हंसते-हंसते अचानक फिर मुंह उतर आया है ,

कुछ पल जिंदगी में ऐसे होते हैं, जिनमें आंखें रोती हैं और होंठ हसते हैं।

बस ,ऐसे ही पल का पहला अनुभव उन्हें हो आया है ।

खुद को संभाल ,मैंने पापा को झटपट समझाया

होगी बस सगाई ही ,मां ने बतलाया है ।

चिंता ना करें आप ! आपकी बिटिया अभी कहीं नहीं जाएगी ,

पापा बोले गुड़िया अगले महीने शादी की तारीख भी आएगी ,

तब मेरी राजकुमारी की विदाई हो जाएगी ।

ना जाने ! कैसा है बेटा जमाने का यह दस्तूर ,

हर पिता हो जाता है इसके आगे मजबूर ।

ना चाहते हुए भी करना पड़ता है, अपने जिगर के टुकड़े को खुद से दूर ।

यह सुनकर मेरी आंखें भर आई थी फिर मैंने किया आग्रह

एक ,

मां कृपया ढूंढिए घर जमाई नेक ।

ये शादी होगी बहुत निराली ,

क्यों ना करें दूल्हे की विदाई की तैयारी ।

पापा ने मुझे बात तब अपनी समझाई ,

जग कि है यह ऐसी रीत ,जिसके साथ चलने में ही है सबका हित।

मां- पापा फिर मुस्काते हैं और बारी -बारी से मुझे गले लगाते हैं !

मां ने कहा हो गई है बहुत देर, पर चलो कम से कम पापा और उनकी राजकुमारी समझ गए हैं ,अब जीवन का यह फेर ....!

Pratima Pandey