हेमंत और शिशिर ऋतु गई है बीत,
पधारे हैं ऋतुराज जिनसे है प्रकृति की प्रीत।
विरह की बेला गई, मिलन की शुभ ऋतु आई है,
चारों तरफ अब हरियाली ही हरियाली छाई है ।
कली कली गई है खिल,
फूलों की खुशबू फिजाओं में गई है मिल।
कोयल आम्र मंजरी से मुग्ध होकर गा रही है मिलन गीत,
कलरव कर दे रहे हैं साज उसके अन्य पक्षी मीत ।
महुआ की डाल ,गेहूं की बाल ऋतुराज के स्वागत में झूम झूम कर रही है नृत्य ,
अहा ! कैसा मनभावन है यह अनुपम दृश्य ।
बागों में भंवरे गुन गुन कर बोल रहे हैं,
फूलों पर मंडराती तितलियों संग मानो खेल रहे हैं।
मनमोहक छटा चहुंओर बिखरी है ,
सरसों के फूलों की पियरी, जो प्रकृति ने पहनी है।
कामदेव जी जिनके हैं दूत,
पधारे हैं वह ऋतुराज वसंत आज खुद ।
हरि चुनरिया ओढ़े ,बसंत जी की दुल्हन सज आई है,
गई विरह की बेला, मिलन की शुभ ऋतु आई है ।
वनस्पति जगत में ही नहीं, प्राणी जगत में भी नई उमंग भर आई है ,
दूर करने निराशा नई आशाएं संग लेकर ,त्योहारों की यह रंग बिरंगी सुखद ऋतु आई है ।
पतझड़ गया अब नव किसलय ने वृक्षों की शोभा बढ़ाई है,
सुनहरी धूप लेकर वसंत की मनमोहक ऋतु आई है।
प्रकृति बहुत खुश है आज , सौंदर्य उन्नति और नवयौवन का लेकर उपहार पधारे जो है उसके सैयां ऋतुराज ।
By- Pratima Pandey


